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स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है कौड़ी का प्रयोग



कौड़ी का हमारे जीवन से सीधा सम्बन्ध है। एक ओर कौड़ी जंहा स्वास्थ्य  लिए बेहतर होती है वहीं दूसरी तरह यह पूजनीय है। कौड़ी एक आभूषण भी है तथा पहले समय में लोग इसे मुद्रा की श्रेणी में रखते थे।  आज के समय में ज्यादातर लोग इसके बारे  जानते कौड़ी एक समुद्रीजीव का अस्थिमय कोश है।  भाषा या प्रान्त भेद  कारण यह अन्य नामों से भी जाना जाता है।  जैसे कौड़ी, कपर्दिका, वराटिका, बदअ, कजक, खरमोहरा आदि।  कौड़ी में कैल्शियम, फास्फेट, कार्बोहाइड्रेट, फ्लोराइड, मैगनीशियम पाया जाता है।  
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बेहतर स्वास्थ्य के लिए कौड़ी को जलाकर उसका भस्म बना लिया जाता है तथा इस भस्म की मात्रा सामान्यत: दो से चार रत्ती या आठ सौ मि. ग्रा. मानकर नीबू के रस या पान के रस, घी और शहद के साथ प्रयोग करें।  इससे खट्टी डकारें, अफारा, प्यास, उदर-वात, मांदारागिन आदि रोगों में उपयोगी है।  पित्त की अम्लता को कम करने के इसमें विशेष गुण है।  कौड़ी शंख भस्म बराबर  की  मात्रा मिलाकर नीबू के रस में  मिलकर पीने से पेट की गैस, अफारा, अजीर्ण में तुरंत लाभ देता है।  अजीर्ण में में शहद के साथ भी ली जा सकती है।  इसके अतिरिक्त पेट दर्द, उलटी होतो  अनार के रस से देना हितकार होता है।  अजीर्ण , बदहजमी में हिंग्वाष्टक चूर्ण में साथ गर्म पानी से लाभकारी है।  अम्लपित्त, खट्टी डकारे एवं वमन में स्वर्ण मिश्रित भस्म मिलकर देना लाभकारी है। श्वास रोग में पिप्पली चूर्ण और शहद मिलाकर दे।  भूख कम लगने, पाचनक्रिया बाधित होतो (त्रिकूट ) सोंठ, कालीमिर्च, पिप्पल के समभाग के साथ हितकर है।  सूखी खांसी में मलाई में मिलाकर दिन में दो बार देने से लाभ होता है।  कील मुहांसे के लिए पीली कौड़ी को नीबू के रस में भिगोएं, फिर खूब महीन पीस कर मलाई में मिलाकर मुंह में लगाए।  औषधि प्रयोग में पीली कौड़ी ही मान्य है।  कौड़ी का ज्योतिषीय प्रयोग भी किया जाता है।  ध्यान रखे कौड़ी के सेवन से पहले किसी स्थानीय वैद्य से जरूर सलाह लें।  

वैद्य हरिकृष्ण पांडेय 'हरिश' 

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