Header Ads

पथरी में भी लाभकारी जीरा

पथरी में भी लाभकारी जीरा 


जीरा नाम से लगभग सभी परिचित है ज्यादा नहीं तो इतना जरूर जानते है कि, सब्जी दाल में तड़का लगाने के काम आता है।  

इसको पैदावार सभी जगह होती है।  इसकी भी दो जातियां है एक कला जीरा दूसरा सफेद जीरा के नाम से जाना जाता है।  

क्षेत्रिय भाषा में इसको कई नामो से जाना जाता है।  जैसे जीरक, जिरे, जीरं, चोरकम, जिलकारी और क्यूमिन सोड।  





इसमें थाइमिन नामक उड़नशील तैल होता है जिसका प्रतिशत 3.5 से 5.2 तक होता है।  इसी तेल के कारण इसमें मनभावन सुगंध होती है।  

सूजन या दर्द वाले स्थान पर इसको पानी में पीस कर लेप करने से सूजन मिटती है, दर्द कम होता है।  

इसके नियमित सेवन से पाचन क्रिया सही रहती है, भूख बढ़ती है, दवा खारिज होती है तथा पेट के कीड़े मरते है।  

इसका काढ़ा बना कर गर्भाशय धोने से वंहा की सूजन मिटती  है।  चमड़ी के रोग जैसे (कण्डु) खाज, पामा, खुजली में जीरा का लेप उपयोगी है।  लाल दाने हो खुजली चले तो जीरा के पानी से धोने से खुजली दाने में लाभ होता है बवासीर में जीरा पानी में पीस कर गुदा मार्ग या बांधने से आराम मिलता है।  

बिच्छू काटे स्थान पर जीरा का लेप करने से जहर उतरता है पीड़ा शांत होती है।  (मूत्राघात) बून्द बून्द पेशाब आना, कष्ट से पेशाब आना, पेशाब में मवाद जाना।  पथरी आदि को परेशानी में जीने का चूर्ण बना कर तीन ग्राम की मात्रा में पानी से दो तीन बार देने से लाभ होता है।  

युवतियों के वक्ष स्थल अविकसित हो तो जीरा चूर्ण गुड़ के साथ लेने से वक्ष स्थल सुडौल बनता है।  नाक में होने वाली फुंसियो  में जीरा कपडे में बांध कर सूंघने से लाभ होता है।  

प्रसूता का उचित मात्रा में दूध न उतरता हो तो जीरे के लड्डू बना कर खिलाने से दूध प्रचुर मात्रा में उतरने लगता है।  

मुंह में दुर्गन्ध आती हो तो जीरा को पानी में उबाल कर कुल्ले करने से लाभ होता है।  शराबी या अन्य नशे के आदि व्यक्ति को तलब लगने पर जीरा मुँह में डाल कर चूसने से तलब में कमी आती है।  लगातार के प्रयोग से व्यसनी को सहायता मिलती है।  



वैद्य हरिकृष्ण पाण्डेय 'हरीश'






    

कोई टिप्पणी नहीं